वृंदावन में श्रीकृष्ण की रासलीलाएं ब्रज की चेतना हैं, जिनमें भक्ति, कला, दर्शन और प्रेम का अद्भुत समन्वय विद्यमान है।
इस परंपरा को सहेजने और आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचाने हेतु गीता शोध संस्थान एवं रासलीला अकादमी द्वारा जो कार्य किया जा रहा है, वह अत्यंत अनुकरणीय और प्रेरक है।
भगवान कृष्ण की लीलाओं का मंचन, न केवल मंचों पर भक्तिपूर्ण प्रस्तुति होती है, बल्कि यह ब्रज की रास परंपरा की जीवंत पुनर्प्रस्तुति के रूप होता है। प्रशिक्षु बालक–बालिकाओं के माध्यम से प्रस्तुत रासलीला, एक सांस्कृतिक उत्तराधिकार को अगली पीढ़ी तक हस्तांतरित करने की सुंदर प्रक्रिया है।
ब्रज तीर्थ विकास परिषद, उत्तर प्रदेश सरकार के संरक्षण में वृंदावन स्थित गीता शोध संस्थान, बीते साढ़े तीन वर्षों में न केवल अनेक लीलाओं का प्रशिक्षण व मंचन कर चुका है, अपितु गीता जैसे आध्यात्मिक ग्रंथ के प्रचार-प्रसार में भी उल्लेखनीय भूमिका निभा रहा है। स्कूलों व कॉलेजों में गीता पर आधारित प्रेरक कार्यक्रमों के माध्यम से हमारे युवा अपनी जड़ों से पुनः जुड़ रहे हैं।
पर्यटन एवं संस्कृति विभाग का सदैव यह प्रयास रहा है कि उत्तर प्रदेश की ऐतिहासिक–सांस्कृतिक परंपराएं अक्षुण्ण रहें और उन्हें नवीन ऊर्जा मिले। इस दिशा में उप्र ब्रज तीर्थ विकास परिषद के अधिकारियों के सानिध्य में गीता शोध संस्थान का यह प्रयास सांस्कृतिक योजनाओं के धरातल पर उतरने का जीवंत प्रमाण है। ब्रज की कृष्ण लीलाओं का बच्चों को प्रशिक्षण देना, उनसे मंचन कराना निश्चित ही ब्रज संस्कृति को बचाने का ठोस प्रयास है।
वृंदावन की पुण्यभूमि पर श्रीकृष्ण की रासलीलाएं केवल भक्ति का अभिनय नहीं, अपितु ब्रह्म और भक्ति के मिलन की दिव्य अनुभूति हैं। रास परंपरा ने भारत की अध्यात्म, कला, संगीत और समाज चेतना को हजारों वर्षों तक दिशा दी है।
आज के आधुनिक युग में जब सांस्कृतिक मूल्यों का क्षरण देखा जा रहा है, ऐसे समय में गीता शोध संस्थान एवं रासलीला अकादमी, वृंदावन द्वारा किया जा रहा कार्य अत्यंत महत्वपूर्ण एवं प्रशंसनीय है।
“भ्रमर गीत, नित्य रास, मुदरिया चोरी, कालिया मर्दन आदि” तमाम लीलाओं का यह मंचन न केवल परंपरा का संरक्षण है, बल्कि यह भावी पीढ़ी में ब्रज की सांस्कृतिक स्मृति को जागृत रखने का सशक्त प्रयास भी है। इस प्रकार की प्रस्तुति बच्चों में आत्मगौरव, सांस्कृतिक जड़ता और राष्ट्रीय चेतना को बल प्रदान करती है।
उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा स्थापित ब्रज तीर्थ विकास परिषद का यह ध्येय रहा है कि ब्रज के तीर्थ, कला, लोक परंपरा, भक्ति एवं संस्कृति को संरक्षण एवं संवर्धन मिले। यह आयोजन उसी दिशा में एक प्रभावशाली कड़ी है।
– चंद्र प्रताप सिंह सिकरवार
कोआर्डिनेटर: शोध, ग्रंथागार, सांस्कृतिक प्रशिक्षण, जनसंपर्क व प्रकाशन
गीता शोध संस्थान एवं रासलीला अकादमी, वृंदावन
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