जयपुर रंगायन में गूंजा वृंदावन का “भ्रमर गीत”

वृंदावन। ब्रज की सांस्कृतिक परंपराएँ जहाँ भी जाती हैं, वहाँ अपनी अमिट छाप छोड़ जाती हैं। हाल ही में जयपुर के जवाहर कला केंद्र स्थित रंगायन सभागार में यह अनुभव सजीव हुआ, जब गीता शोध संस्थान एवं रासलीला अकादमी, वृंदावन के प्रशिक्षुओं ने “भ्रमर गीत” का मंचन प्रस्तुत किया।
सभागार दर्शकों से खचाखच भरा था। जब मंच पर राधा-कृष्ण की भावनाएँ गूँजीं, तो वातावरण दिव्य रस में सराबोर हो उठा। प्रस्तुति का निर्देशन संस्थान के निदेशक प्रो. दिनेश खन्ना ने किया तथा संयोजन चंद्र प्रताप सिंह सिकरवार ने संभाला। संगीत-साधना में आकाश शर्मा (हारमोनियम व गायन), मनमोहन कौशिक (सारंगी), दीनानाथ (बाँसुरी) और सुनील पाठक (तबला) की संगति ने पूरे मंचन को जीवंत कर दिया।
नृत्य निर्देशन सोचना शर्मा और परिधान विन्यास रितु सिंह का था, जबकि सह-समन्वय में सुश्री मोहिनी कृष्णदासी का योगदान रहा। कलाकारों में कामिनी शर्मा, सुमति भारद्वाज, प्रियांशु उद्धव, हरी चौटाला तथा अनेक प्रशिक्षुओं ने अपने-अपने पात्रों को जीवंत कर दिया।
दर्शकों का कहना था कि इतनी भव्य और हृदयस्पर्शी रासलीला उन्होंने पहली बार देखी।
वास्तव में, “भ्रमर गीत” की यह प्रस्तुति केवल एक सांस्कृतिक आयोजन नहीं थी, बल्कि राजस्थान की धरती पर ब्रज रस की अलौकिक वर्षा थी—एक ऐसा अनुभव जिसे लंबे समय तक भुलाया नहीं जा सकेगा।